शंका


एक है परिचित सा अपरिचित व्यक्ति
जो शाम सुबह मुझे दिखता है
कभी आंखों में कभी बातों में 
दर्पण में मेरे दिखता है

कदम को मेरे पीछे करता 
स्वर मेरा ऊंचा नीचा करता 
विश्वास पर मेरे करता घात 
मति को मेरे देता मात

संध्या पश्चात प्रबल हो जाता
दिन में चिप जाता परछाई में
है एक परजीवी दीमक जैसा
अंतर्मन को मेरे खाता है

मुड़ मुड़ देखू, पीछे मैं
क्यों मुझे एक बात सताती है
न साया है,न कोई प्रेत विचित्र
ये मेरी शंका मुझको डराती है

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